February 28, 2021

खुलासा मीडिया

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नीतीश टूट सकते हैं झुक नहीं सकते हैं !

प्रशांत झा

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जेडीयू राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ने से बीजेपी की जान सांसत में पड़ गयी है . जेडीयू के बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार का अभी कार्यकाल लगभग डेढ़ साल बचा था पर बिहार चुनाव में पार्टी की हार की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ा है . लेकिन बीजेपी के सामने सवाल है की क्या अरुणाचल में बीजेपी के गठबंधन धर्म के खिलाफ चाल चलने से आहत नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ा है? बीजेपी के रणनीतिकार कहते हैं जो नीतीश कुमार जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पाने के लिए शरद यादव , जॉर्ज फर्नांडिस सरीखे नेताओं को पार्टी से बाहर जाने पर मजबूर कर दिए वे बिहार में हार या अरुणाचल में जेडीयू विधायक के पाला बदलने से पार्टी सुप्रीमो का पद नहीं छोड़ सकते . नीतीश कुमार पहली बार 2016 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे. लेकिन उन्होंने पार्टी की कमान रामचन्द्र प्रसाद सिंह उर्फ़ आरसीपी को जिम्मेदारी सौंप कर जो संकेत बीजेपी नेताओं को दिया है उससे साफ़ है की बीजेपी की बिहार में वे प्रेशर स्वीकार करने के मूड में नहीं है . यह नीतीश कुमार के दूरगामी रणनीति का हिस्सा है की पुरे देश में अपनी छवि की चिंता और अपने सख्त तेवर से बीजेपी के रणनीतिकार और अमित शाह को बता देना की वे टूटना जानते हैं झुकना नहीं .
वैसे आपको याद दिला दें की 2014 में बीजेपी से अलग होने के बाद जब लोकसभा चुनाव में जेडीयू की करारी हार हुई थी तो उस दौरान भी नीतीश कुमार ने अपनी छवि की चिंता करते हुए हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बिहार के मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था और जीतन राम मांझी से दलित नेता को सी एम की कुर्सी सौंप दी थी.


बिहार विधान सभा 2020 के चुनाव में जेडीयू को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो पार्टी के भीतर और बाहर की चर्चाओं पर विराम लगाने के लिए थोड़े दिन तक तो नीतीश कुमार खामोश हो गए पर भीतरी तौर पर वे मंथन में जुट गए थे . इसी बीच बीजेपी ने बिहार मंत्रिमंडल में सीटो की संख्या को लेकर जिस तरह का रुख अख्तियार किया और फिर अरुणाचल में जीदीयु के उन छह विधायको को पार्टी में शामिल कर लिया जो बीजेपी को समर्थन कर रहे थे तो नीतीश कुमार तिलमिला उठे . पटना में कार्यकारणी की बैठक में आये के सी त्यागी ने जब बीजेपी नेतृत्व को गठबंधन धर्म के सहारे नीचता पर अंगुली दिखाया तो बीजेपी नेतृत्व को अंदाजा हो गया की नीतीश कुमार कोई बड़ा खेल राष्ट्रीय कार्यकारणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में करेंगे .क्योंकि इसके पीछे की हकीकत यह थी की नीतीश कुमार की खामोशी बहुत कुछ कहने लगी थी.
आपको बता दें की नीतीश कुमार ने विधान सभा चुनाव रिजल्ट आने के बाद एनडीए नेताओं के साथ अपनी पहली मीटिंग में ही मुख्यमंत्री पद लेने से मना कर दिया था . यही बात उन्होंने जेडीयू की राष्ट्रीय परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए दोहराया कि उन्हें सीएम बनने की तनिक भी इच्छा नहीं थी. और जब उनसे पीएम ने बात की उसके बाद ही वे सी एम बनने को तैयार हुए . हालांकि नीतीश कुमार ने खुलासा किया की वे चाहते थे की बीजेपी का ही कोई नेता सीएम पद सम्हाले . और आज भी सीएम बने रहने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है.
मुख्यमंत्री का पद नीतीश कुमार ने भले ही बीजेपी शीर्ष नेतृत्व के कहने पर स्वीकार कर लिया लेकिन जेडीयू के नॅशनल प्रेसिडेंट का पद उन्होंने छोड़ दिया .विधानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद से वह लगातार पार्टी नेताओं, पराजित उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं से फीडबैक् लेते रहे थे . इस बार के विधानसभा चुनाव में जदूय को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के पीछे सियासी प्रपंच को भी बड़ा कारण खुद नीतीश कुमार ने माना और इसकी चर्चा भी इस बार के जेडीयू की बैठक में हुई .
जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी 2016 अव सम्हाल रहे नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री रहते उसके विस्तार पर ध्यान देंगे. आपको याद होगा की जब जेडीयू का गठन 2003 में की गयी थी तो जॉर्ज फर्नांडिस के अध्यक्ष रहने और उसके बाद शरद यादव के अध्यक्ष रहने के दौरान नीतीश कुमार ने पार्टी को बाहर से बहुत मदद की थी और पार्टी को चरम पर पहुंचाया था. नीतीश कुमार के करीबियों का कहना है की नीतीश कुमार राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अलग होने के बाद पार्टी को मज़बूत करेंगे. पर राजनीति की समझ रखने वाले जानते है की नीतीश कुमार को समझ लेना उतना ही कठिन है जितना की नीतीश के फैसले को समझना.


बहरहाल ,अपने खासमखास आर सी पी को पार्टी की कमान सौंपने के बाद नीतीश कुमार की खरमास राजनीति और रणनीति शुरू हो गयी है और बीजेपी के साथ उनका छाया युद्ध की शुरुवात कर दी गयी है . अब बीजेपी के बिहार नेतृत्व में नीतीश कुमार को समझाने की ताकत रखने वाले कोई नहीं है क्योंकि बीजेपी ने सुशील मोदी को दिल्ली शिफ्ट करके यह मौंका गंवा दिया है और बिहार में दुसरे जिन नेताओं की नीतीश सुनते थे उन्हें भी साइड लाइन किया है तो अब बीजेपी नेतृत्व को नीतीश कुमार के हर वार को सचेत करने वाले भी नहीं तो खामियाजा तो अंततः बीजेपी को भुगतना होगा.